सदी के सबसे बड़े इस इम्तहान में दाँव पर लगी हैं जिन्दगियाँ

 

कोरोना ::  बड़ा इम्तहान

कुछ के टले इम्तहान
दसवीं के निरस्त हुए
कुछ खुश, तो परेशान हैं काफी
अपने फ्यूचर को लेकर |

मामला अब बच्चों से निकल चुका है बहुत आगे
कतई न टलने वाले पेपर मे अब सभी के इम्तहान शामिल हैं

सदी के सबसे बड़े इस इम्तहान में
दाँव पर लगी हैं अरबों जिन्दगियाँ
कोई हाथ खाली नहीं
क्वेश्चन पेपर से

सवाल बेमेल
कोई किसी को चाहकर भी
नहीं करा सकता नकल
बाजार में गाइड या कुंजी नहीं
तुम्हारी तैयारी, समझदारी तुम्हारी
आयेगी काम
वरना….. काम तमाम|

वक्त की शिला पर
चीखते, कलपते लोग
अपनों के फेल होने का
मातम मना रहे
क्रूर पेपरसेटर ने
कोई रियायत, कोई विकल्प नहीं दे रक्खे हैं
कृपाँक का सवाल ही नहीं
यानी फेल तो फेल
बड़े-बड़े विज्ञानी, गणितज्ञ
माथा पीट रहे
दुनिया के ताकतवर मुल्क
रेंगने पर आ गये
उनकी कड़कदार आवाजें
गुम हो गयीं कोरोना के विलाप में|

दनादन चेक हो रहीं कॉपियाँ
हाथोंहाथ रिजल्ट बँट रहा
पास होकर लौटते लोगों के घरों में उत्सव है
जो फेल हो गये
वहीं जम गये
कर रहे वे अपने लिए चार कंधों का इंतजार

घरों, दफ्तरों, रेलवे और बसटेसनों,
बाजार, शादी समारोहों
सभी जगह लोग दे रहे पेपर
लोगों के चेहरे पीले पड़ते जा रहे
समझ नहीं पा रहे
कैसे पास होंगे
शर्त है बची जिंदगी चाहिये
तो जरूरी है पास होना|

घरों में बैठे ज्यादातर लोग
हो सकते हैं पास
क्योंकि वे सबसे सुरक्षित लोग हैं

कोई पलटकर इस वक्त देखने वाला नहीं
खिले फूलों को
अमराइयों की मादक गंध
कोयल की मीठी तान
सुनने वाला नहीं
दिन मे तीन बार काढ़ा पी रही प्रेमिकाएं
डूबी हैं
हिरनी जैसी आँखें उदासी में|

इस वक्त सब
बस सीने पर बोझ लादे
अपने अपने पेपर से कराह रहे
इस इम्तहान से
बेड़ा पार कब होगा
कोई बता नहीं पा रहा
जोतिषी-धर्माचार्य
पीर-औलिया बस मल रहे हाथ
कर ही क्या सकते वे
धर्मग्रंथों के इक -इक हर्फ़ में
रोशनी तलाशने के अलावा

अस्पतालों के बाहर-भीतर
सबसे ज्यादा अफरातफरी
पेड़ों के दुश्मन आक्सीजन आक्सीजन चिल्ला रहे
राजा प्रजा को संबोधित कर रहा …संकट की घड़ी है
सब दुरुस्त हो जायेगा
चारों तरफ फिर भी बिलबिला रही प्रजा
एक एक सांस की खातिर
मारामारी
पहले कब हुई थी
कोई इतिहासकार बतायेगा?

इतना कठिन इम्तहान…हे राम!
न्यूज चैनल वाले
मारे डाल रहे भय से
पटक रहे मौत का चाबुक|

रातोगिन फेंकर रहे फेल..फेल…फे…ल
दु:सह-दुष्कर वक्त में
ऊपर से नीचे तक छोटे-बड़े
सभी हुक्मरान हाँफ रहे
कोई टोकने वाला नहीं
पूछने वाला नहीं, आखिर
कोरोना-परास्त कर
जो घर लौटे
उन्हें क्यों नहीं दिखा रहे
उनके अपनों के मुस्कुराते चेहरे
सौ ताले में कहाँ बन्द हैं
खाली चिता, श्मशान
चीत्कार पर पालथी मारे बैठे….|

उम्मीद का तिनका
कसकर पकड़े रहो लोगों
तुम्हारा होना अब
पास होना है तुम्हारा|

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*संतोषकुमार तिवारी*
रामनगर, नैनीताल