कविता में दर्ज है कोरोना की विभीषिका

 

फोटो परिचय : आनलाइन चर्चा एवं कविता-पाठ करते युवा साहित्यकार संतोष तिवारी

दुनियाभर में फैली बीमारी या महामारी हमेशा से साहित्य की विषय-वस्तु रही है। इतिहास उतनी बारीकी से बीमारियों के उपजने-फैलने का विश्लेषण नहीं कर पाता जितना साहित्य करता है। विभिन्न वेब पोर्टल, फेसबुक आदि सोशल मीडिया में कोरोनाकाल के संत्रास एवं साहस दोनों तरह की कविताओं को देखा जा सकता है। यह कविताएँ कोरोनाकाल की छटपटाहट को बखूबी बयां करती हैं।  उक्त विचार युवा कवि एवं लेखक संतोष तिवारी ने कुमाऊँ विश्वविद्यालय की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ द्वारा ‘कोरोनाकाल में हिंदी कविता’ विषय पर फेसबुक लाइव के जरिए आयोजित आॅनलाइन चर्चा में व्यक्त किए।
उन्होंने कोरोनाकाल में अशोक वाजपेयी, रामदरश मिश्र, लीलाधर जगूड़ी, ज्ञानेन्द्रपति, ओम निश्चल, लीलाधर मंडलोई, एस.आर. हरनोट, बोधिसत्व, संजय कुंदन, मदन कश्यप, देवी प्रसाद मिश्र, श्रीप्रकाश शुक्ल, सुभाष राय, शैलेय, हरि मृदुल, व्योमेश शुक्ल आदि द्वारा लिखी कविताओं का जिक्र करते हुए कहा कि सदी की इस विभीषिका में साहित्य में जो कुछ दर्ज हुआ, वह मुश्किल समय में मनुष्य की जिजीविषा की अमिट गाथा है। कोरोनाकाल में अवसाद और तनाव के बीच जन्मी कविता ने मनुष्य को आत्मबल प्रदान किया है।
कार्यक्रम के दूसरे चरण में कवि-लेखक संतोष तिवारी ने अपनी कविताओं दिन में तीन बार काढ़ा पी रही प्रेमिकाएँ, घास काटती औरतें, हमें नहीं पता, तुम्हें मुबारक, ये किसानों की आत्महत्या का मौसम है, कोसी माँ है, फिलहाल सो रहा था ईश्वर, केदारनाथ, पिता घड़ी थे, खास महामंडलेश्वर, माँ की पीठ, मोहल्ला, सारे फूल, मुश्किल दिनों में, एक दिया इनके नाम का, प्रेम में डूबना तथा बच्चों के खेल का पाठ किया।
कविता ‘कोरोना पर बात करते वक्त’ का पाठ करते हुए उन्होंने कहा ‘काॅफी की पहली घूँट गले से उतरते ही वे बच्चे याद आए जो दूध के बगैर रोते-रोते सो गए। याद आए हजारों वे लोग जो भूखे थे खासकर उस समय जब मैं अपने खाने की मेज पर था। एसी कमरे में घुसते वक्त श्रमवीरों की कतारें याद आयीं जो नंगे पैर सड़कों पर चलते जा रहे थे निरंतर। याद आयी वह लड़की कार ड्राइविंग करते हुए खासकर मुझे जिसने साइकिल के कैरियर पर पिता को बिठाए गुड़गाँव से दरभंगा तक पैडलों से नाप लिया इतना लम्बा सफर। याद आए वे लोग जिनकी नौकरियाँ चली गई जो तबाह हो गए एक तरीके से जब मैं आॅफिस जाने को तैयार हुआ। याद आए।’
उल्लेखनीय है कि साहित्यकार संतोष तिवारी कविता सहित गद्य लेखन में एक परिचित नाम है। अयोध्या के एक साधारण परिवार में जन्मे श्री तिवारी का पहला काव्य संग्रह ‘फिलहाल सो रहा था ईश्वर’ 2013 में आया तो दूसरा संग्रह ‘अपने-अपने दंडकारण्य’ 2019 में छपा। राजकीय इंटर कालेज, ढिकुली (रामनगर) में हिन्दी प्रवक्ता संतोष तिवारी की कविताएं किसी तरह का कोई कौतुक करती प्रतीत नहीं होतीं, परंतु जीवन के सबरंग, दुख, करुणा, विषाद, विद्रूपता, प्रेम…सब कुछ तो उसमें भरा पड़ा है| देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी कविताएँ बराबर पढ़ने को मिलती रहती हैं| सन् 2020 में कबीर संस्थान, अयोध्या ने आपको ‘शब्दश्री सम्मान’ से नवाजा| रामनगर (नैनीताल) में आठ वर्षों से ‘सरोकार’ नाम की साहित्यिक संस्था के आप संयोजक हैं| उत्तराखंड पाठ्यपुस्तक लेखक-मंडल के सदस्य श्री तिवारी इधर के दो वर्षों से कविता के अलावा ललित निबंध एवं बच्चों के लिए हिन्दी-भाषा एवं व्याकरण को सरस-सुगम बनाने की दिशा में ‘संधि-विच्छेद’ (प्रकाशित) तथा ‘मानक हिन्दी व्याकरण’ तैयार करने में संलग्न हैं|
कार्यक्रम में महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. शिरीष कुमार मौर्य, शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत सहित वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. दिवा भट्ट, डाॅ. सिद्धेश्वर सिंह, महेश पुनेठा, डाॅ. अमित श्रीवास्तव, मुकेश नौटियाल, महाबीर रंवाल्टा, अनिल घिल्डियाल, मोती प्रसाद साहू, खेमकरण सोमन, शिव प्रकाश त्रिपाठी, ममता रावत, डाॅ. कमलेश कुमार मिश्रा, मेधा नैलवाल, रमेश द्विवेदी, मोनिका गौड़, अल्पना सिंह, प्रदीप बहराइची, सुभाषित श्रीवास्तव, अभिसार तिवारी, सत्य प्रकाश शर्मा, डाॅ. कल्पना शाह, गोविंद नागिला, डाॅ. गिरीश पाण्डेय ‘प्रतीक’, चिंतामणि जोशी, डाॅ. भावना जोशी पाठक, दिनेश रावत, लक्ष्मण बिष्ट, डाॅ. विवेकानंद पाठक, डाॅ. भावना अग्रवाल, आशा जोशी, राजनंदन शर्मा विमलेंदु, सुमन कुकरेती, दिनेश चंद्र भट्ट, बीना तिवारी, इन्दु त्रिपाठी, दीपा गोरखा, गीता तिवारी, भानुप्रकाश रघुवंशी, दिनेश सेमवाल, नवीन तिवारी, संजय पाण्डे, तरूण जोशी, डाॅ. शशिशेखर मिश्र वात्स्यायन, परेश पाण्डे, दीप चन्द, अजीत सक्सेना, रजनी रानी, नीलम पारीक, सुब्रत प्रकाश, विंथ्य मणि, मनोज पुनेठा आदि साहित्य प्रेमी सम्मिलित हुए।