जंगल का वैभव, जहाँ प्रकृति अलसायी लेटी है…

ललित निबंध….

कालिदास के मेघदूत में यक्ष मेघ से बहुत सी बातें कहता है उनमें उत्तरमेघ में वह कहता है कि अलकापुरी की कुलवधुएं हाथों में कमल के आभूषण पहनती हैं , अपनी चोटियों में नये खिले हुए कुंदन के फूल गूँथा करती हैं , अपने मुँह को लोध के फूलों का पराग मलकर सुवर्णा होती हैं और अपने जूड़े में कुरबक के फूल खोंसा करती हैं| कानों में सिरस के फूल, और वर्षा में कदंब के फूलों से अपनी माँग संवारा करती हैं…यह उल्लेख इसलिए कि भाँति -भाँति के समस्त आभूषण तो मानवनिर्मित हैं , परंतु प्रकृति के करीब जाने पर वह सारा नैसर्गिक वैभव अपनी संपूर्ण हार्दिकता के साथ आपकी आँखों में समाता चला जायेगा| कालिदास की शकुंतला की विदाई के वक्त तो ऋषि अपने पास से एक कतरन तक नहीं देते, सब कुछ उन्हें प्रकृति देती है, सजाती – संवारती तो हमेशा से ही वही रही है| वह वास्तविक वन-कन्या हैं|


श्रीराम अपने भाई व पत्नी के साथ वन-गमन करते हैं| उन्हें पता है कि वहाँ जो जन मिलेंगे वे वनरक्षक होंगे| उनकी कुटिया मनोरम होगी| उसके आसपास सिंह-पिक-मैना और गजराज टहलते मिलेंगे|
और सबसे बड़ी बात सीता तनिक भी उदास न रह सकेगी| भवभूति उत्तररामचरित मे लिखते हैं कि सीता वन से जितना परिचित हैं उतना राम नहीं|
अपने निर्वासन पर वे उसी वन में वापस आती हैं| उन्होने इस बार हिरन के अलावा हाथी तक बड़े जीव को पालन – पोषण किया हाथी के बच्चे के साथ लवकुश खेलते हैं| बहरहाल,
यह उल्लेख प्रसंगवश मैं जब भी जिम कॉर्बेट की बाँहे फैलाये घने साल और चीड़ के गझिन जंगलों के बीच से गुजरता हूँ तो याद आ जाता है| हमें आपको गिने- चुने फूलों के नाम पता हैं, बाकी तो खिलते और मुरझाकर गिर जाते हैं| शहरी जीवन में बाकी तो कंक्रीट की लंबी- चौड़ी सड़कें , बड़ी बड़ी अट्टालिकाओं की चाह में तो हम सब गले जा रहे|
खैर, आप जब भी जंगल में जाने / घूमने की योजना बनायें तो इस तरह प्रवेश करें कि जैसे हरियाली के आँगन में प्रवेश कर रहे, जहाँ प्रकृति पल्लवों के बिस्तर पर लेटी है| समीरन
वनलतिकाएं पंखा बन धीरे – बह रही हैं| वहां तमाम जंगली जानवर अपने सलीके के साथ जी रहे हैं| जब कोई जंगलराज कहकर शासन /प्रशासन का उपहास करता है तो सच मानिये , बहुत बुरा लगता है| वह जंगल ही नहीं परिपक्व जंगलियत का भी मखौल उड़ाता है|उसे अपने मन के बियाबान को पहले दुरपस्त करना चाहिये|
ऐसे बीरबहादुर बयानबाज जैवविविधता को भी इग्नोर करते हैं|यहाँ प्रवासी पंछियों , तितलियों , भौरों, झींगुरों , कीट- पंतिगों की सत्ता में कोई छोटा- बड़ा नहीं| सबकी आवाजाही, उनकी ध्वनियाँ, जैसे वे तुम्हें ही पुकार रहे हों, लगता है|
गजराज और वनराज का मिलना स्वप्न जैसा है| तो कभी तो रास्ते में मिल जाते हैं| उनकी आबादी भी हमारे तरह कहाँ हैं? उनकी गर्जना और चिंघाड़ ही उनकी उपस्थिति है| हाथी परिवार में मातृसत्तात्मक नेतृत्व तथा बाघ के शावकों को लेकर बाघिन उन्हें जंगल के इलाके की परिधि में घुमाकर ये जताती है कि पूरे वनक्षेत्र तुम्हारा| कल से तुम्हारी चलेगी|
बहरहाल, जंगल का संविधान , वहां के कानून- कायदे – अनुशासन सभ्य समाज के आत्मसात की विषयवस्तु है|
मगर हम मानने वाले कहाँ|
हम अपकी अकड़ और कमअक्ली में ही फूले हैं|
पुन: लौटुंगा हे वनदेवता, वनदेवी और पंछियों|
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*संतोषकुमार तिवारी*
रामनगर के ढिकुली इंटर कालेज में प्रवक्ता हैं| लेखन से जुडे़ हैं| इनकी दो कविता की किताब छप चुकी है| अब ललित निबंध लिख रहे हैं| पीरुमदारा में रहते हैं|
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