राम को जब भी देखो, योद्धा के रूप में तैयार दिखते हैं|

विजयादशमी(15 अक्टूबर21) पर विशेष

 

राम को जब भी देखो,एक योद्धा के रूप में तैयार दिखते हैं| जीवन पर्यन्त वे अपने देशकाल- परिवेश से युद्धरत दिखते हैं| राजपुत्रों जैसा पोषण तो हुआ परंतु आमोद-प्रमोद ,शिकार व अन्य युवराजपन से वे सर्वदा दूर रहे| पिता दशरथ के नेत्रों की ‘जोत’ , राम का बचपना ठीक से बीता भी नहीं था कि यज्ञ-रक्षा के लिए ऋषि विश्वामित्र ने उन्हें माँग लिया| पिता व अन्य माताओं सहित कौशल्या राम-लक्ष्मण को सीने पर पत्थर रखकर उन्हें सौंपती हैं| राजा जनक द्वारा आयोजित स्वयंवर में उन दोनों भाइयों की उपस्थिति मात्र संयोग है| पुष्पवाटिका में पृथ्वीपुत्री और पृथ्वीपालक के प्रथम परस्पर दर्शन लाभ से कवियों को आगे लिखने के लिए बहुत सारी सामग्री मिल गयी|

रावण और बाणासुर का स्वयंवर में पहुँच हुंकार भरते हैं | यह देख-सुन सीता का मन एक पल आकुल हुआ,परंतु श्रीराम ने धनुष तोड़कर शंका निर्मूल कर दिया, और सियावर रामचंद्र कहलाये|

सीता ब्याहकर प्रथम बार अयोध्या पहुँचीं, नगर जगमग था , किंतु वचन से घिरे चक्रवती दशरथ राम को राज्य देते – देते वनवास दे बैठते हैं| भरत से भी अधिक प्रिय राम को कैकेयी व नववधू सीता को अपने हाथों वनवासियों का वस्त्र सौंपती हैं| राज्याभिषेक के उत्सव में अयोध्या की वीथियाँ पंखुरियों से पटी हैं |उसी पर राम , सीता व लखनलाल नंगे पाँव वन के लिए निकलते हैं| राम का मन ऐसे हालात में भी द्वन्द्वरिक्त है| वे ऋतु-मार स्वयं झेलकर सीता को शीतलता देते हैं
*घामको राम समीप महाबल|*
*सीतहिं लागत है अति सीतल||*
*ज्यों घन-संजुत दामिनिके तन|*
*होत हैं पूषनके कर भषन*||
[केशवदास कृत रामचंद्रिका : अयोध्याकांड-6]

आगे जो-जो घटित होता है उससे गहरे से जुड़कर राम का मनस्ताप महसूस किया जा सकता है| ईशरत्व के मिथकीय परिधि से यदि बाहर निकलकर देखा जाये तो वे पग-पग पर चौकन्ने
युद्धरत योद्धा हैं| सीताहरण के बाद भाई की मूर्च्छा पर विलाप करते राम अत्यधिक कातर हो विलाप करने लगते हैं|

संकोची राम लंका विजय का श्रेय न लेकर कपिराज व वानरयूथ को देते हैं| अयोध्या लौटते हैं तो नगरवासी इस बात से खुश हैं कि चलो, अब प्रभु राम के गद्दी संभालने का मार्ग निष्कंटक हो गया| मगर विधना के खेल निराले थे|राजा राम प्रजा के परमप्रिय बने रहने की फेर में आसन्नप्रसवा सीता का परित्याग जिस परिस्थित में करते होंगे,आप सोच सकते हैं|

ढीठ धोबी को डाँटना -फटकारना भी उन्हें राजधर्म के विरुद्ध लगता है, करें तो करें क्या| जायें कहाँ, मनायेें किसे, खद से रूठने के अलावा कोई विकल्प नही उनके पास|
श्रीराम पहले मृग-लोभ में फंसते हैं ,बाद में लोक-लोभ में टूटते हैं|

आज, जहाँ सत्ता सुख के आगे सब कुछ व्यर्थ है, सारहीन है| रोज नयी रार और कलह है| ऐसे में राम जी की तरह जीवट वाला नायक, जो हर मुसीबत में कुंदन बनकर चमकता है, का बारंबार स्मरण होता है| काश , लोगबाग राम जी को पूजने के औसत में आचरण में भी उतार लेते तो दुनिया भर में सत्ताधीश और जन के बीच की दरारें, संदेह और माराकाटी का नामोनिशां मिट जाता|
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लेखक *संतोषकुमार तिवारी*
रामकथा के अध्येता हैं|
अयोध्या निवासी हैं , नैनीताल में प्रवक्ता हैं|
संपर्क : 08411759081
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