उर्मिला श्रद्धा की पात्रः शुभी

युगतुलसी पं. राम किंकर उपाध्याय  जयंती समारोह

अयोध्या। मां उर्मिला दया नहीं श्रद्धा की पात्र हैं। उन्होंने जिस जिजीविषा और दृढ़ संकल्प से अपनी गुरु गार्गी के बताए संकेत पर चलते हुए विरह का जीवन व्यतीत किया, और लक्ष्मण जी के अनन्य प्रेम और ब्रह्मचर्यनिष्ठ जीवन उसका संबल बनता रहा। ये बातें भगवान राम के वनवास जीवन के सहचर भाई लक्ष्मण और उनकी पत्नी को मां ईश्वरीय माता पिता मानने वाली कानपुर की नवोदित उपन्यासकार शुभी ने कही।

वह लक्ष्मण जी और उर्मिला जी के जीवन पर केंद्रित अपने उपन्यास लक्ष्मीला पर चल रहे विमर्श पर आयोजित कार्यक्रम में अपने साक्षात्कार और प्रश्नोत्तरी कार्यक्रम में बोल रही थीं। यह कार्यक्रम युग तुलसी पं. राम किंकर उपाध्याय जी की जयंती के अवसर पर आयोजित किया गया था। उनकी शिष्या एवं उत्तराधिकारी साध्वी मंदाकिनी श्रीरामकिंकर के सानिध्य में आयोजित इस विमर्श में उनका साक्षात्कार औऱ विमर्श का संचालन लेखिका व कवियत्री पूनम सूद कर रही थीं।

मात्र चौदह वर्ष की उम्र में जो अनुभूति और ईश्वरीय कृपा मुझ पर हुई
शुभी ने कहा कि यह लोग विश्वास करे या ना करें, लेकिन मात्र चौदह वर्ष की उम्र में जो अनुभूति और ईश्वरीय कृपा मुझ पर हुई। ध्यान और संवाद के माध्यम से जो अनुभव होते गए, मैं वही लिखती गई। इन अलौकिक विषयवस्तु पर अध्ययन और शोध मात्र से लिखना संभव नहीं था, क्योंकि श्री लक्ष्मण जी और उर्मिला जी के बारे में धार्मिक वांग्मय से लेकर साहित्य तक में बहुत की कम लिखा पढ़ा गया है। अधिकांश साहित्य में वह उपेक्षिता और दया का बोध कराती स्त्री हैं।
कार्यक्रम का संचालन कर नर्मदा प्रसाद मिश्र ने विमर्श की पीठिका रखी। इस कार्यक्रम में साकेत महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य डा. अजय मोहन, अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष प्रो. असीम त्रिपाठी, डा. उषा त्रिपाठी, डा. रुपाली श्रीवास्तव, साहित्यभूषण प्रमोद कांत, साहित्यकार और वरिष्ठ पत्रकार ज्ञान प्रकाश टेकचंदानी सरल, साकेत महाविद्यालय के प्रबंध समिति के सचिव दीप कृष्ण वर्मा, कवि व चिंतक आशीष अंशुमाली. राम प्रकाश दूबे, कायस्थ धर्म सभा की महिला सभा की अध्यक्ष पल्लवी वर्मा, संजीव वर्मा सहित नगर के गणमान्य व साहित्यसुधी उपस्थित थे।