जगद्गुरु रामानुजाचार्य आचार्य रत्नेश  

भरत प्रेम की मूर्ति है,उन्होंनेश्रीराम प्रेम से समूची दुनिया को भर दिया – जगु रत्नेश

प्रेम पाना नहीं दूसरे के लिये स्वयं को खोना होता है :आचार्य रत्नेश

अयोध्या l सभी धर्मों का सार प्रेम है।प्रेम में परिवर्तन करने की क्षमता होती है।प्रेम के विना दुनिया नहीं चल सकती।भरत प्रेम की मूर्ति है।भरत जी ने राम प्रेम से पूरी दुनिया को भर दिया

जगद्गुरु रामानुजाचार्य आचार्य रत्नेश

था।जो भरण पोषण करे उसे भरत कहते हैं।प्रेम से ही भरण पोषण होता है।स्वार्थ हमें लोभी बनाता है ,प्रेम हमें त्याग सिखाता है।प्रेम पाना नहीं दूसरे के लिये स्वयं को खोना होता है।भरत ने अयोध्या की प्राप्त राजसम्पत्ति का त्याग कर दिया था और श्रीराम भी अयोध्या की सम्पदा को छोड़कर वन चले गये थे।श्रीराम और भरत दोनों ने त्याग किया दोनों प्रेम से प्रपूरित थे।स्वार्थ लोगों को तोड़ता है और प्रेम लोगों को जोड़ता है। यह तात्विक बोध जगद्गुरु रामानुजाचार्य आचार्य रत्नेश महाराज की व्याख्यान माला के हैं l

उन्होंने कथा प्रसंग को विस्तार देते हुए कहा कि जो आज सिर्फ अपने लिये जीवन जीता है, उसका “मरण” होता है। जो दूसरों के लिये जीता है, उसका “स्मरण” होता है। अगर मरने के बाद भी जीना चाहो, तो एक काम जरूर करना। पढ़ने लायक कुछ लिख जाना, या लिखने लायक कुछ कर जाना…! जो व्यक्ति शुभ चिंतन की ऊर्जा से अपने सद्गुणों को जगाए रखते हैं, वे एक अच्छे इंसान की छवि निर्मित कर लेते हैं। अच्छा-बुरा सब कुछ हमारे भीतर है। बुराई पलभर में किसी भी पूज्य को निंदनीय व्यक्ति बना सकती है। अत: हम संकल्प लें कि हमारे मन का शिवरूप सदा जाग्रत रहे..।
ईश्वर की बनाई हुई सृष्टि से, प्राणीमात्र से जो प्रेम करता है; ईश्वर उससे प्रेम करता है ..! मानव-जीवन परमात्मा की महती कृपा है। व्यक्ति और कुछ भी तो नहीं, परमात्मा का ही एक अंश है, जिसको परमात्मा ने स्वयं ही अपने से पृथक कर पुनर्मिलन के लिए निर्मित किया है। परमात्म-मिलन ही मानव-जीवन का ध्येय है। इस ध्येय की पूर्ति प्रेम द्वारा ही हो सकती है। जिन मनुष्यों के बीच परस्पर प्रेम सौहार्द और सहयोग की भावना रहती है, जो दूसरों से प्रेम और प्राणी मात्र पर दया का भाव रखते हैं और जो सबके प्रति स्नेह एवं शिष्टता का व्यवहार करते हैं, वे सब परमात्मा से मिलने के अपने ध्येय की ओर ही अग्रसर होते रहते हैं। अध्यात्म का मूल मंत्र प्राणिमात्र के प्रति प्रेम है। भक्ति साधना से मुक्ति का मिलना निश्चित है। जिस भक्त को परमात्मा से सच्चा प्यार होता है, वह भक्त भी परमात्मा को प्यारा होता है। उपनिषद् का यह वाक्य ‘रसो वै सः …’ इसी एक बात की पुष्टि करता है – ‘‘परमात्मा प्रेम रूप है’ इसका स्पष्ट तात्पर्य यही है कि जिसने प्रेम की सिद्धि कर ली है, उसने मानो परमात्मा की प्राप्ति कर ली है अथवा जहाँ प्रेमपूर्ण परिस्थितियाँ होंगी, वहाँ परमात्मा का वास माना जायेगा। इस प्रकार परमात्मा की प्राप्ति आनन्द का हेतु होता है …।
साँसारिक जीव ही नहीं, ईश्वर तक प्रेम के वश में हो जाता है। ‘भक्त के वश में भगवान’- यह कथन आज नया नहीं है। यह युगों से अनुभूत किया हुआ एक सत्य है। जिन महात्माओं, संतों और साधुजनों ने भगवान की भक्ति की है, उससे निश्छल-प्रेम किया है, उन्होंने भगवान को अपने वश में कर लिया है। उसे दर्शन देने के लिये मजबूर कर लिया है। तुलसी, सूर, मीरा, नानक आदि सन्त इसके प्रमाण हैं। प्रेम का यह प्रभाव कोई चमत्कार नहीं है, बल्कि यह एक आध्यात्मिक तथ्य है।

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